कोरोना वायरस के प्रकोप से बचने के लिए मुसलमानों के धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगाना सही या गलत? पढ़िए गुफरान शैख़ की यह रिपोर्ट। >> चम्पारण टूडे

कोरोना वायरस के प्रकोप से बचने के लिए मुसलमानों के धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगाना सही या गलत? पढ़िए गुफरान शैख़ की यह रिपोर्ट। >> चम्पारण टूडे

गुफरान शैख़ : आज पूरी दुनिया आज कोरोना वायरस के प्रकोप से जूझ रहा है, दुनिया भर के कई देशों को पूर्ण लॉकडाउन कर दिया गया है और इस कड़ी में भारत भी जूड़ चुका है, भारत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नेे सभी राज्यों को पूर्ण रूप से लॉकडाउन कर दिया है। लॉकडाउन की स्तिथि में समस्त धार्मिक स्थलों को भी बन्द कर देने का सरकार ने आदेश दिया है, मुस्लिम समुदाय के धर्मगुरू ने सरकार के लॉकडाउन का समर्थन करते हुए मस्जिदों में तीन से पांच लोगों को नमाज़ पढ़ने की अपील की है, वहीं जुमा की नमाज़ के लिए भी मस्जिदों में एकठ्ठा ना होने की अपील की है, और अपने अपने घरों में जोहर की नमाज़ अदा करने की अपील की गई है।


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सन 639 ई. में फैला था ताऊन वायरस

18 हिजरी (639 ई.) में अमीरूल मोमिनीन उमर फारूक (रजि) के जमाने में ताऊन नामक वायरस का प्रकोप हुआ तो उस जमाने में भी कोरेनटाइन कर के लोगों को वायरस के प्रकोप से बचाने के लिए सख्ती से पालन कराया गया था। इतनी सख्ती थी कि वायरस का प्रकोप शाम (सिरिया) और इराक़ से बाहर ना जा सका। उस वक्त अमीरूल मोमिनीन यात्रा कर रहे थे जब "तबूक" नामक जगह पर पहुँचे तो ताऊन वायरस का पता चला तो अपने ही बनाए कानुन को मानते हुए आगे बढ़ने के बजाए वापस हो गए।
ताऊन वायरस से मरने वालों की संख्या 25000 थीं, उनमें सिपहसालार ओबैदा बिन जर्राह भी ताऊन वायरस के चपेट आ गए थे और उसी वायरस ने उनकी जान ले ली। उस समय न तो मुसलमानों की आस्था कमज़ोर थी और न ही इस्लाम का उससे कोई लेना-देना था, ना उस समय के मुत्तकी और परहेज़गार लोगों के बहुमूल्य जीवन तक़वा और परहेज़गारी की वजह के कारण जीवित रहे। जो लोग कहते हैं कि सलाम करते समय हाथ का मिलाना सुन्नत है, वह सही कहते हैं मगर उनका यह कहना कि किसी को नुकसान पहुँचने के अंदेशे के बावजूद हाथ मिलाना सुन्नत है, यह गलत है, बल्कि यहां हाथ ना मिलाना सुन्नत है।
"सकीफ" से एक प्रतिनिधि मंडल में एक कोढ़ी व्यक्ति भी दरबार-ए-रिसालत (स.अ.व.स)में हाजिर हुआ। रसुलुल्लाह (स.अ.व.स) ने उसे वहीं से लौटा दिया, ना अमलन बैत किया, ना हाथ मिलाई। (सही मुस्लिम: 2231)
ऐसे मौके पर हाथ मिलाना सुन्नत नहीं, बल्कि हाथ ना मिलाना सुन्नत है।
जो लोग कहते हैं, ईमान के होते हुए एहतियात की कोई जरूरत नहीं, वह गलत कहते हैं। 
रसुलुल्लाह (स.अ.व.स) ने फरमाया। "कोढ़ी से ऐसे भागो, जैसे शेर से खौफजदा हो कर भागते हो।" (बुखारी: 5707)
तो पता चला ऐसे मौके पर वायरस से संक्रमित लोगों का सामना करना नहीं, बल्कि बचना सुन्नत है।


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जो लोग कहते हैं कि हमें अल्लाह पर भरोसा है और एहतियात की कोई जरूरत नहीं, वह गलत कहते हैं। 
मेरे आका ﷺ का फरमान है "ऊंट को रस्सी से बाँधो, फिर अल्लाह पर भरोसा करो" (तिर्मिजी: 2517)
पता चला एहतियाती कार्य करना भी अल्लाह पर भरोसा करना है।
क्योंकि हजरत उमर (रजि) ताऊन वायरस से संक्रमित एरिया में नहीं गए और एहतियात बरतने का काम किया था। तो आज के किसी भी व्यक्ति का ईमान, भरोसा, तक़वा और परहेजगारी हजरत उमर (रजि) से बढ़कर नहीं हो सकता चाहे वह कहे कि हमें फांसी दे दो, या गोली मार दो।
कहने का मतलब साफ है कि सरकार के कानून का पालन करें, मस्जिदों में भीड़ एकठ्ठा ना करें, मोहल्लों और चौराहों पर भीड़ एकत्रित ना होने दे, सरकार के फैसले का सम्मान करें और इस बीमारी से बचाव के लिए जो एहतियात स्वास्थ्य कर्मियों की जानिब बातई जा रही है उस पर पूर्ण सहयोग करें, मानवता बचाएं परिवार बचाएं और खूद को भी बचाएं। धन्यवाद।।


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काबा का तवाफ रूकना।


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इतिहास में कई बार काबा का तवाफ रूका है.... 

सन 929 ई. में करामतियों हज को पूराने जमाने का रिवाज करार दे कर लगभग दस सालों तक मुसलमानों को हज से रोके रखा, खाना काबा में हाजियों का कत्लेआम किया और हजरे असवद को चोरी कर के ले गए जिसे 20 साल बाद हासिल कर के लाया जा सका।


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सन 1814 ई. में ताऊन की वजह से हज रोक दिया गया।

सन 1883 ई. में हैजा की वजह से हज पर रोक लगा दिया गया।


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सन 1979 ई. में झीमान अल उतैबी ने जब हरम शरीफ पर कब्जा किया तो दो सप्ताहों के लिए तवाफ और नमाज़ पर रोक लगा दी।

सन 2017 ई. में भगदड़ की वजह से तवाफ रोक दी गई। 

इस के अलावा तेज़ बारिश और सैलाब की वजह से कई बार तवाफ पर रोक लगाई गई। 

यह सारी घटनाएं किस की हुकूमत में और क्यों पेश आईं यह आप इतिहास में या गूगल कर के भी चेक कर सकते हैं।

सऊदी सरकार ने मानवता को बचाने के लिए, सेनिटाइज करने के लिए, कोरोना वायरस के चैन को तोड़ने के लिए और दवा के छिड़काव के लिए तवाफ को रोक कर रखा हुआ फिर दुसरी ओर तीसरी मंजिल पर तवाफ हो रहा है। इस लिए सऊदी सरकार को कोसने के बजाए रब से अपने गुनाहों की माफी के तौबा इस्तगफार करने की जरूरत है। क्योंकि वही सब का मालिक और खालिक है, सबकी जान उसी के कब्ज़े में है।